25 जनवरी 2007 की बात है, मैं अपने एक भाई साहब के साथ घूमते हुए आ रहा था, साथ में एक सज्जन और थे। वजीराबाद पुल के पास सड़क के किनारे गाड़ी रोककर लगे पैक बनाने...फिर शुरु भी हो गया। मगर सब कुछ शॉर्ट कट था। लाख “साथ दो...” कहने पर भी मैं साथ रहकर भी साथ न दे सका कि पहली बार रास्ते में ही...कहीं ढ़ुलक न जाऊं। थोड़ी ही देर बाद बगल से गुजरती एक इनफिल्ड रुकी....दो दिल्ली पुलिस। बंद गाड़ी का कांच ओस से भींगा था, पुलिस के टॉर्च की ऱोशनी अंदर तक न झांक पाई। फिर उसके कहने पर गाड़ी का गेट खुला।
“ये क्या है..?” टॉर्च की रोशनी पैक पर थी।
“यह मैं ले रहा हूं सर...” बगल में बैठे सज्जन ने यहा जताया कि ड्राइव करने वाला बंदा नहीं पी रहा।
“कोई भी ले रहा हो, चलती गाड़ी में यह गैरकानूनी है, उसमें भी कल रिपब्लिक डे है, थाना चलो।” फिर गाड़ी नं0 पढ़ा ‘…0001’ और बोला, “भले आपको थाना प्रभारी ऐसे ही छोड़ दें लेकिन आपको साथ ले चलना मेरी ड्युटी है, अभी मेरे साथ चलें...” भाई साहब नें आराम से पॉकेट में हाथ दिया और 50 का नोट निकालकर आगे बढ़ा दिया, मैं देखता जा रहा था कि क्या होता है। पुलिस वह रुपया पकड़ते बोला,
“सरजी, इससे तो पौओ (मतलब क्वार्टर भी) नहीं होगा...” भाई साहब ने फुर्ती से 50 का एक और नोट आगे बढ़ाया। फिर दोनों जनाब चलते बने। मैं आंखें फाड़ते देखता रह गया कि फर्ज बघारने वाले के ईमान की कीमत सिर्फ 100 रुपया...
Friday, June 22, 2007
इससे तो पौओ नहीं होगा सर
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